संधारित्र में संचित ऊर्जा

संधारित्र अध्ययन के हम कई article अपने Blog पर Share कर चुके है।  इससे पिछले Article संधारित्र का सयोंजन श्रेड़ी क्रम व् समान्तर क्रम Share किया था।  यदि आपने उसे अभी तक नहीं पढ़ा है, तो पढ़ ले।  

उस लेख में हमने पढ़ा था की प्रत्येक संधारित्र में दो चालक (माना A व B) होते है। या प्रत्येक संधारित्र दो चालको का एक निकाय होता है। जिस पर आवेश क्रमश: +q व -q होता है।

संधारित्र में संचित ऊर्जा क्या है ?


"संधारित्र को आवेशित करने में किया गया कार्य इसमे ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है। इसे संधारित्र की संचित ऊर्जा कहते है।"

माना संधारित्र एक बैट्री में है, तो जब बैट्री को आवेश दिया जायेगा, तब बैट्री में आवेश रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित हो जायेगा।  इसी कार्य को संधारित्र में संचित ऊर्जा कहते है। 


                                                                                  तथा
संधारित्र की एक प्लेट से दूसरी प्लेट तक आवेश ले जाने में कुछ कार्य करना पड़ता है। यह कार्य स्थितिज विद्युत ऊर्जा के रूप में संधारित्र में संचित हो जाता है। 
माना किसी  क्षण  संधारित्र का विभव v है। और उसको आवेश dq प्रदान किया जाता है। जब आवेश dq संधारित्र को प्रदान किया जाएगा। तो उसके लिए कुछ कार्य करना पड़ेगा। अतः कार्य dw स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाएगा। 

स्थितिज ऊर्जा के रूप में वृद्धि 
                                                                 dW= v'dq 
संपूर्ण आवेश स्थानांतरित करने के लिए समाकलन का प्रयोग किया जाता है।

संधारित्रों के उपयोग 

संधारित्र का उपयोग छत के पंखो में , टेबल पंखो में, मोटरो में, स्पार्किंग काम करने में, AC se DC प्राप्त करने आदि में किया जाता  है। 

 
ऊर्जा को संचय करने में 

आवेशित संधारित्र की प्लेटो के बीच विद्युत क्षेत्र में स्थितिज ऊर्जा संचित रहती है। यदि संख्या में बहुत अधिक आवेशित संधारित्रों का सयोजन बनाये तो उसमे आवेशों की मात्रा अधिक होगी। जिससे  उसमे ऊर्जा अधिक संचित होगी।

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